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आज है बहुत खास दिन गणेश जी की ऐसे करें पूजा, सब मनोकामनाएं हो जाएगी पूर्ण

बुधवार का दिन भगवान गणेश का दिन है. हर काम की शुरुआत से पहले इनकी पूजा करना काम सफल बनाता है. ऐसा माना जाता है कि इनकी पूजा करना सारे संकट दूर करता है. हम आपसे साझा कर रहे हैं इस दिन गणेश पूजा की कथा. साथ ही हम ये भी बताएंगे कि भगवान गणेश को क्या अर्पित करना उन्हें प्रसन्न करता है.

 

गणेश पूजा विधि

सुबह स्नान-ध्यान से निवृत होकर तांबे के पात्र में गणेश जी की मूर्ति स्थापित करें. पात्र को इससे पहले अच्छी तरह से साफ कर लें. पूजा की जगह पर पूर्व दिशा में मुख करना शुभ होता है. संभव न हो तो उत्तर दिशा की ओर चेहरा कर पूजा की शुरुआत करें. आसन पर बैठें और भगवान गणेश की फूल, धूप, दीप, कपूर, चंदन से पूजा करें. दूब यानी दूर्वा अर्पित करना काफी शुभ माना जाता है. पूजा के अंत में गणेश जी को मोदन अर्पित करें. आखिर में मन ही मन भगवान का ध्यान करते हुए इस मंत्र का 108 बार जाप करें- ॐ गं गणपतये नमः.

 

गणेश जी की कथा

बहुत से लोग किसी भी काम का शुभारंभ करने से पहले सबसे पहले श्रीगणेशाय नम: लिखते हैं. इसके पीछे मान्यता है कि गणेश जी की पूजा करने से किसी भी शुभ कार्य में कोई बाधा नहीं आती है. पौराणिक कथा भी है कि एक बार देवताओं में इस बात को लेकर विवाद हो गया कि आखिर किस भगवान की पूजा सबसे पहले की जाए. सभी देवता खुद को सर्वश्रेष्ठ बता रहे थे. इसी दौरान वहां पहुंचे नारद जी ने सभी देवताओं से कहा कि इस मामले को सुलझाने के लिए शिव भगवान की शरण में जाना सही है. सबकी बात सुनने के बाद भगवान शिव ने वहां देवताओं के लिए एक प्रतियोगिता आयोजित की और कहा कि जो देवता ब्रह्माण्ड का चक्कर लगाने के बाद सबसे पहले उनके पास वापस लौटेगा, वही सर्वश्रेष्ठ है और उसी की पूजा सबसे पहले की जानी चाहिए. जहां सभी देवता चक्कर लगाने में व्यस्त थे, भगवान गणेश ने शिव-पार्वती यानी अपने माता-पिता की परिक्रमा की और कहा कि यही मेरे लिए मेरा ब्रह्माण्ड हैं. तब से ही हर काम की शुरुआत गणेश जी की पूजा से की जाती है.

 

बुधवार को करें ये उपाय

*समृद्धि के लिए बुधवार के दिन गणेश जी को घी और गुड़ का भोग लगाएं और इस भोग को गाय को खिलाएं. इससे धन-संपत्ति में इजाफा होता है.

*अगर घर पर किसी तरह की कोई बाधा लग रही हो तो सफेद रंग के गणेश जी की मूर्ति स्थापित करें. इससे भय दूर होता है.

*घर के भीतर कलह-क्लेश रोकने के लिए दूर्वा के गणेश भगवान बनाएं और उनकी पूजा विधि-विधान से करें. इससे प्रेम बढ़ता है.

*मान्यता है कि घर के मुख्य द्वार पर भगवान गणेश की मूर्ति लगाने से नकारात्मक शक्तियां घर के भीतर नहीं आ पाती हैं.

 

 

महिलाओं के लिए यह व्रत उपयोगी माना जाता है। इस दिन तिल दान का विशेष महत्व होता है। भगवान श्रीगणेश को चंद्रोदय के समय अर्घ्य दिया जाता है।

 

 

ऐसे करें भगवान श्रीगणेश का पूजन
आज चंद्रोदय रात्रि 9.30 मिनट पर रहेगा।
गणेश मंत्र – ‘ॐ गणेशाय नमः’ का जाप 108 बार करें।
आज के दिन सुबह स्नान कर स्वच्छ वस्त्र धारण करें।

 

व्रत धारण करने वाले लोग लाल वस्त्र पहन सकते हैं।
पूजन करते वक्त मुख उत्तर या पूर्व दिशा की ओर रखें।

 

गणेशजी की पूजा के लिए थाली में फल, फूल, रोली, मौली, अक्षत और पंचामृत रखें।

 

 

भगवान गणेश को तिल से बनी वस्तुओं का भोग लगाएं।
शाम के समय गणेश चतुर्थी की कथा पढ़ें।

 

 

 

श्री गणेश चालीसा
भगवान गणेश प्रथम पूजनीय देव माने जाते हैं। कोई भी शुभ काम शुरु करने से पहले गणेश की पूजा की जाती है, जिससे सारे कार्य सूख पूर्वक संपन्न हो जाते हैं।
॥दोहा॥
जय गणपति सदगुणसदन, कविवर बदन कृपाल।
विघ्न हरण मंगल करण, जय जय गिरिजालाल॥
जय जय जय गणपति गणराजू।
मंगल भरण करण शुभ काजू ॥
॥चौपाई॥
जै गजबदन सदन सुखदाता। विश्व विनायक बुद्घि विधाता॥
वक्र तुण्ड शुचि शुण्ड सुहावन। तिलक त्रिपुण्ड भाल मन भावन॥
राजत मणि मुक्तन उर माला। स्वर्ण मुकुट शिर नयन विशाला॥
पुस्तक पाणि कुठार त्रिशूलं । मोदक भोग सुगन्धित फूलं ॥1॥
सुन्दर पीताम्बर तन साजित । चरण पादुका मुनि मन राजित ॥
धनि शिवसुवन षडानन भ्राता । गौरी ललन विश्वविख्याता ॥
ऋद्घिसिद्घि तव चंवर सुधारे । मूषक वाहन सोहत द्घारे ॥
कहौ जन्म शुभकथा तुम्हारी । अति शुचि पावन मंगलकारी ॥2॥
एक समय गिरिराज कुमारी । पुत्र हेतु तप कीन्हो भारी ॥
भयो यज्ञ जब पूर्ण अनूपा । तब पहुंच्यो तुम धरि द्घिज रुपा ॥
अतिथि जानि कै गौरि सुखारी । बहुविधि सेवा करी तुम्हारी ॥
अति प्रसन्न है तुम वर दीन्हा । मातु पुत्र हित जो तप कीन्हा ॥3॥
मिलहि पुत्र तुहि, बुद्घि विशाला । बिना गर्भ धारण, यहि काला ॥
गणनायक, गुण ज्ञान निधाना । पूजित प्रथम, रुप भगवाना ॥
अस कहि अन्तर्धान रुप है । पलना पर बालक स्वरुप है ॥
बनि शिशु, रुदन जबहिं तुम ठाना। लखि मुख सुख नहिं गौरि समाना ॥4॥
सकल मगन, सुखमंगल गावहिं । नभ ते सुरन, सुमन वर्षावहिं ॥
शम्भु, उमा, बहु दान लुटावहिं । सुर मुनिजन, सुत देखन आवहिं ॥
लखि अति आनन्द मंगल साजा । देखन भी आये शनि राजा ॥
निज अवगुण गुनि शनि मन माहीं । बालक, देखन चाहत नाहीं ॥5॥
गिरिजा कछु मन भेद बढ़ायो । उत्सव मोर, न शनि तुहि भायो ॥
कहन लगे शनि, मन सकुचाई । का करिहौ, शिशु मोहि दिखाई ॥
नहिं विश्वास, उमा उर भयऊ । शनि सों बालक देखन कहाऊ ॥
पडतहिं, शनि दृग कोण प्रकाशा । बोलक सिर उड़ि गयो अकाशा ॥6॥
गिरिजा गिरीं विकल है धरणी । सो दुख दशा गयो नहीं वरणी ॥
हाहाकार मच्यो कैलाशा । शनि कीन्हो लखि सुत को नाशा ॥
तुरत गरुड़ चढ़ि विष्णु सिधायो । काटि चक्र सो गज शिर लाये ॥
बालक के धड़ ऊपर धारयो । प्राण, मन्त्र पढ़ि शंकर डारयो ॥7॥
नाम गणेश शम्भु तब कीन्हे । प्रथम पूज्य बुद्घि निधि, वन दीन्हे ॥
बुद्घ परीक्षा जब शिव कीन्हा । पृथ्वी कर प्रदक्षिणा लीन्हा ॥
चले षडानन, भरमि भुलाई। रचे बैठ तुम बुद्घि उपाई ॥
चरण मातुपितु के धर लीन्हें । तिनके सात प्रदक्षिण कीन्हें ॥8॥
तुम्हरी महिमा बुद्घि बड़ाई । शेष सहसमुख सके न गाई ॥
मैं मतिहीन मलीन दुखारी । करहुं कौन विधि विनय तुम्हारी ॥
भजत रामसुन्दर प्रभुदासा । जग प्रयाग, ककरा, दर्वासा ॥
अब प्रभु दया दीन पर कीजै । अपनी भक्ति शक्ति कछु दीजै ॥9॥
॥दोहा॥
श्री गणेश यह चालीसा, पाठ करै कर ध्यान।
नित नव मंगल गृह बसै, लहे जगत सन्मान॥
सम्बन्ध अपने सहस्त्र दश, ऋषि पंचमी दिनेश।
पूरण चालीसा भयो, मंगल मूर्ति गणेश ॥

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